Tuesday, August 9, 2011

Khumaar sahab ki dil ko choo lene wali ghazale

MaiN sach kahooN to KHUMAR sahab se meri waaqfiyat kal hi hui hai aur uske baad mujhe behad ta'jjub aur hairat hui ki abhi tak maiN unke lajawab kalaam se mahroom kaise rah gaya, aaj maiN KHUMAR sahab ka kalaam paDhke dil se unka fan ho gaya hooN aur mujhe fakhr hota hai kya ghazab ki riwaayeti shaa'iri hai unki aur kya andaaz-e-bayaaN hai, aur tarannum aisa ki seedhe dil ki gahraaiyoN meiN utar ke halchal paida kar de. to lijiye pesh-e-khidmat haiN KHUMAR sahab ki chuninda ghazleiN:.


1--

हम उन्हें वो हमें भुला बैठे

दो गुनहगार ज़हर खा बैठे


हाल-ऐ-ग़म कह-कह के ग़म बढ़ा बैठे

तीर मारे थे तीर खा बैठे


आंधियो जाओ अब आराम करो

हम ख़ुद अपना दिया बुझा बैठे


जी तो हल्का हुआ मगर यारो

रो के हम लुत्फ़-ऐ-गम बढ़ा बैठे


बेसहारों का हौसला ही क्या

घर में घबराए दर पे आ बैठे


जब से बिछड़े वो मुस्कुराए न हम

सब ने छेड़ा तो लब हिला बैठे


हम रहे मुब्तला-ऐ-दैर-ओ-हरम

वो दबे पाँव दिल में आ बैठे


उठ के इक बेवफ़ा ने दे दी जान

रह गए सारे बावफ़ा बैठे


हश्र का दिन है अभी दूर 'ख़ुमार'

आप क्यों जाहिदों में जा बैठे

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2-------------------------------------

ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं रही

जज़्बात में वो पहले-सी शिद्दत नहीं रही


सर में वो इंतज़ार का सौदा नहीं रहा

दिल पर वो धड़कनों की हुक़ूमत नहीं रही


पैहम तवाफ़े-कूचा-ए-जानाँ के दिन गए

पैरों में चलने-फिरने की ताक़त नहीं रही


चेहरे की झुर्रियों ने भयानक बना दिया

आईना देखने की भी हिम्मत नहीं रही


कमज़ोरी-ए-निगाह ने संजीदा कर दिया

जलवों से छेड़-छाड़ की आदत नहीं रही


अल्लाह जाने मौत कहाँ मर गई 'ख़ुमार'

अब मुझको ज़िन्दगी की ज़रूरत नहीं रही



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3-----------------------------------


हिज्र[1] की शब[2] है और उजाला है

क्या तसव्वुर[3] भी लुटने वाला है


ग़म तो है ऐन ज़िन्दगी लेकिन

ग़मगुसारों ने मार डाला है


इश्क़ मज़बूर-ओ-नामुराद सही

फिर भी ज़ालिम का बोल-बाला है


देख कर बर्क़[4] की परेशानी

आशियाँ[5] ख़ुद ही फूँक डाला है


कितने अश्कों को कितनी आहों को

इक तबस्सुम[6] में उसने ढाला है


तेरी बातों को मैंने ऐ वाइज़[7]

एहतरामन हँसी में टाला है


मौत आए तो दिन फिरें शायद

ज़िन्दगी ने तो मार डाला है


शेर नज़्में शगुफ़्तगी मस्ती

ग़म का जो रूप है निराला है


लग़्ज़िशें[8] मुस्कुराई हैं क्या-क्या

होश ने जब मुझे सँभाला है


दम अँधेरे में घुट रहा है "ख़ुमार"

और चारों तरफ उजाला है

शब्दार्थ:

1. ↑ जुदाई
2. ↑ रात
3. ↑ कल्पना
4. ↑ बिजली
5. ↑ घर , आशियाना
6. ↑ मुस्कुराहट
7. ↑ उपदेशक
8. ↑ लड़खड़ाहटें




4-----------------------------



वो हमें जिस कदर आज़माते रहे

अपनी ही मुश्किलो को बढ़ाते रहे


थी कमाने तो हाथो में अब यार के

तीर अपनो की जानिब से आते रहे


आँखे सूखी हुई नदियाँ बन गई

और तूफ़ा बदस्तूर आते रहे


कर लिया सब ने हमसे किनारा मगर

एक नास-ए-गरीब आते जाते रहे


प्यार से उनका इंकार बरहक मगर

उनके लब किसलिए थरथराते रहे


याद करने पर भी दोस्त आए न याद

दोस्तो के करम याद आते रहे


बाद-ए-तौबा ये आलम रहा मुद्द्तो

हाथ बेजाम भी लब तक आते रहे


अल्लमा लफ़्जिशे यक तब्बसुम "खुमार"

ज़िन्दगी भर हम आँसू बहाते रहे


5----------------------------------

हाले-ग़म उन को सुनाते जाइए

शर्त ये है मुस्कुराते जाइए


आप को जाते न देखा जाएगा

शम्मअ को पहले बुझाते जाइए


शुक्रिया लुत्फ़े-मुसलसल का मगर

गाहे-गाहे दिल दुखाते जाइए


दुश्मनों से प्यार होता जाएगा

दोस्तों को आज़माते जाइए


रोशनी महदूद हो जिनकी 'ख़ुमार'

उन चराग़ों को बुझाते जाइए


6---------------------------------


सुना है वो हमें भुलाने लगे है

तो क्या हम उन्हे याद आने लगे है


हटाए थे जो राह से दोस्तो की

तो पत्थर मेरे घर में आने लगे है


ये कहना थ उनसे मुहब्ब्त हौ मुझको

ये कहने मे मुझको ज़माने लगे है


कयामत यकीनन करीब आ गई है

"ख़ुमार" अब तो मस्ज़िद में जाने लगे है



7------------------------------

वो जो आए हयात याद आई

भूली बिसरी सी बात याद आई


कि हाल-ए-दिल उनसे कहके जब लौटे

उनसे कहने की बात याद आई


आपने दिन बना दिया था जिसे

ज़िन्दगी भर वो रात याद आई


तेरे दर से उठे ही थे कि हमें

तंगी-ए-कायनात याद आई



8--------------------------------

वो खफा है तो कोई बात नहीं

इश्क मोहताज-ए-इल्त्फाक नहीं


दिल बुझा हो अगर तो दिन भी है रात नहीं

दिन हो रोशन तो रात रात नहीं


दिल-ए-साकी मैं तोड़ू-ए-वाइल

जा मुझे ख्वाइश-ए-नजात नहीं


ऐसी भूली है कायनात मुझे

जैसे मैं जिस्ब-ए-कायनात नहीं


पीर की बस्ती जा रही है मगर

सबको ये वहम है कि रात नहीं


मेरे लायक नहीं हयात "ख़ुमार"

और मैं लायक-ए-हयात नहीं


9--------------------------------


ये मिसरा नहीं है वज़ीफा मेरा है

खुदा है मुहब्बत, मुहब्बत खुदा है


कहूँ किस तरह में कि वो बेवफा है

मुझे उसकी मजबूरियों का पता है


हवा को बहुत सरकशी का नशा है

मगर ये न भूले दिया भी दिया है


मैं उससे ज़िदा हूँ, वो मुझ से ज़ुदा है

मुहब्बत के मारो का बज़्ल-ए-खुदा है


नज़र में है जलते मकानो मंज़र

चमकते है जुगनू तो दिल काँपता है


उन्हे भूलना या उन्हे याद करना

वो बिछड़े है जब से यही मशगला है


गुज़रता है हर शक्स चेहरा छुपाए

कोई राह में आईना रख गया है


कहाँ तू "खुमार" और कहाँ कुफ्र-ए-तौबा

तुझे पारशाओ ने बहका दिया है



10------------------------


ग़मे-दुनिया बहुत ईज़ारशाँ है

कहाँ है ऐ ग़मे-जानाँ! कहाँ है


इक आँसू कह गया सब हाल दिल का

मैं समझा था ये ज़ालिम बेज़बाँ है


ख़ुदा महफ़ूज़ रखे आफ़तों से

कई दिन से तबीयत शादुमाँ है


वो काँटा है जो चुभ कर टूट जाए

मोहब्बत की बस इतनी दासताँ है


ये माना ज़िन्दगी फ़ानी है लेकिन

अगर आ जाए जीना, जाविदाँ है


सलामे-आख़िर अहले-अंजुमन को

'ख़ुमार' अब ख़त्म अपनी दास्ताँ है

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Wednesday, June 29, 2011

meri pyaari badi behen Seema gupta ki ek khoobsurat ghazal

ख्वाब जैसे ख्याल होते हैं
इश्क में ये कमाल होते हैं

एक नमूना हो ज़िन्दगी जिनकी
लोग वो बे मिसाल होते हैं

गम अजब हैं यहाँ सितारों के
चाँद को भी मलाल होते हैं

शब् की तनहाइयों में अक्सर ही
जलवा-गर सब ख्याल होते हैं

इश्क बर्बाद हो गया कैसे
हुस्न से ये सवाल होते हैं

उनकी फुरक़त में रात दिन "सीमा"
आजकल हम निढाल होते हैं

Monday, May 2, 2011

Janaab mohtram Mayank awasthi sahab ki behetreen ghazal

जब उसमें जोड़ के तुझको तुझे घटाते हैं
तेरे बयान का सच क्या है जान जाते हैं

ये संगे-मील, कहो, संगे-राह बन जाए
क़दम बढ़ाओ तो मंज़र बदल से जाते हैं

किसी का क़र्ज़ उतरने न देंगे इस दिल से
हरेक ज़ख्म को नासूर हम बनाते हैं

उदास दिल के शरारों को कहकशाँ कह के
ये आसमान हक़ीक़त कोई छिपाते हैं

ये नातवाँ करारी शिकस्त देता है
जब अपने दिल पे कोई ज़ोर आजमाते हैं

कभी मिली थी तिरी मंज़िले- मुराद कहीं
मेरे सफ़र में मराहिल तमाम आते हैं

नदी से प्यास बुझाएँ यही मुनासिब है
हम उसपे हर्फ़े-वफ़ा किसलिये बनाते हैं

खड़े थे दैरो -हरम उस गली के नुक्कड़ पे
जो साँकरी है मगर सरफ़रोश जाते हैं

Friday, March 25, 2011

ghazal by Dr. Asif husain on Tsunami

सुनामी

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बम और तोप गोले बनाने की है सजा

फोजों पे और फोज बढाने की है सजा





सच्चाई पे चले वही नेता बनाना था

नेता भी झूट वाले बनाने की है सजा





दौलत हराम खाए वही हो गया बड़ा

दफ्तर भी रिश्वतो से चलाने की सजा





रब ने मना किया था कि लड़ना नहीं यहाँ

आपस में आदमी को लड़ाने की है सजा





इंसान बाट बाट के क्या क्या बना लिया

इंसानियत पे चोट लगाने की है सज...

Thursday, March 24, 2011

Umda ghazal by dada ji Ahmar kashipuri

Raat hum se hi na kaati gayi tanhayi ki.
tere gham ne to badi housla afzayi ki

kya zarurat hai use anjuman araayi ki
aa gayi raas jise zindagi tanhayi ki

mujhko har haal me takmeel-e-safar karna hai
humnashino meri adat nahi paspaayi ki

ghalib-o-meer ke mansab ko na pahucha koi
yu to logo ne bahut kafiya paimayi ki

aap bhi mere ta-alluq se zabaa"n band rakhe
main bhi koshish na karu apki ruswayi ki

unke deedar se mehroom na reh jau kahi
ae khuda umr bada de meri binaayi ki

paishay-e-charagari kher ho teri lekin
rasm duniya se na uth jaye masihayi ki

gham ne dastak hi nahi di mere dar par AHMAR
balke bazabta tajdeed-e-shanasayi ki.

is ghazal par sabki khas tavajjo ki guzarish hai .shukriya

Wednesday, March 23, 2011

Ek sachchayi - ek tanz - ek zarurat - ek buraayi mere bahut azeez or bade bhai janaab Dr . Asif Husain ki kalam se

Aksar socha karta hun---------Mai hi sabse achha hun

Sabki sunta rehta hun---------Apne dil ki karta hun

Jinse matlab hota hai----------Unko apna kehta hun

Chhote rishtedaaro se---------Thodi doori rakhta hun

Unche naatedaaro se-----------Mai khud jaker milta hun

Jinpar rutba paisa ho-----------Unse yaari karta hun

Saathi hun mazloomo ka-------Zalim se bhi milta hun

Parwaale hai hairat me----------Itnaa uncha udhta hun

Haiwano si harkat hain----------Insaano sa dikhta hun

Rab se sabkuchh paya hai-------Phir bhi rota rehta hun

Saare rishte naate hain----------Lekin bilkul tanha hun

Sab achha ho jaayega-----------Ummido per zinda hun

Mai ASIF hun aisa hi------------Socho kya tum jaisa hun ?????

(dr asif husain)

Saturday, February 26, 2011

john elia pakistan

तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ यह कैसी तन्हाई है
तेरे साथ तेरी याद आई, क्या तू सचमुच आई है

शायद वो दिन पहला दिन था पलकें बोझल होने का
मुझ को देखते ही जब उन की अँगड़ाई शरमाई है

उस दिन पहली बार हुआ था मुझ को रफ़ाक़ात का एहसास
जब उस के मलबूस की ख़ुश्बू घर पहुँचाने आई है

हुस्न से अर्ज़ ए शौक़ न करना हुस्न को ज़ाक पहुँचाना है
हम ने अर्ज़ ए शौक़ न कर के हुस्न को ज़ाक पहुँचाई है

हम को और तो कुछ नहीं सूझा अलबत्ता उस के दिल में
सोज़ ए रक़बत पैदा कर के उस की नींद उड़ाई है

हम दोनों मिल कर भी दिलों की तन्हाई में भटकेंगे
पागल कुछ तो सोच यह तू ने कैसी शक्ल बनाई है

इश्क़ ए पैचान की संदल पर जाने किस दिन बेल चढ़े
क्यारी में पानी ठहरा है दीवारों पर काई है

हुस्न के जाने कितने चेहरे हुस्न के जाने कितने नाम
इश्क़ का पैशा हुस्न परस्ती इश्क़ बड़ा हरजाई है

आज बहुत दिन बाद मैं अपने कमरे तक आ निकला था
ज्यों ही दरवाज़ा खोला है उस की खुश्बू आई है

एक तो इतना हब्स है फिर मैं साँसें रोके बैठा हूँ
वीरानी ने झाड़ू दे के घर में धूल उड़ाई है

john elia pakistan - munfarid shayar

उसके पहलू से लग के चलते हैं
हम कहाँ टालने से टलते हैं

मैं उसी तरह तो बहलता हूँ यारों
और जिस तरह बहलते हैं

वोह है जान अब हर एक महफ़िल की
हम भी अब घर से कम निकलते हैं

क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में
जो भी खुश है हम उससे जलते हैं

है उसे दूर का सफ़र दरपेश
हम सँभाले नहीं सँभलते हैं

है अजब फ़ैसले का सहरा भी
चल न पड़िए तो पाँव जलते हैं

हो रहा हूँ मैं किस तरह बर्बाद
देखने वाले हाथ मलते हैं

तुम बनो रंग, तुम बनो ख़ुशबू
हम तो अपने सुख़न में ढलते हैं

Wednesday, February 9, 2011

Ahmar kashipuri ki umda ghazal

Har chand kuch nahi hai magar kuch na kuch to he
ye inqlaab e shaam o seher kuch na kuch to he
tu husn dilnawaaz ka hamil sahi magar
mera bhi itekhab e nazar kuch na kuch to he
he dosto se mere kashida talluqaat
iski bhi dushmano ko khabar kuch na kuch to he
danishwaraan e sheher me ata he jiska naam
wo bhi junun ka zer e asar kuch na kuch to he
hum laakh be-niyaaz e mohabbat sahi magar
ye izteraab e qalb o nazar kuch na kuch to hai
chalti he thodi door har ek raahrou ke sath
ahmar ye gard e raah-guzar kuch na kuch to hai

Sunday, February 6, 2011

Ahmar kashipuri

Apne khoon me har admi tar tha.
sheher-e-gham ke ajeeb manzar tha
Jaam toota ke mera dil toota .
aaena aaena barabar tha
jaan kar tashna lab raha warna
mere age khula samandar tha
Jisko manzar samajh rahe the log
kuch nahi tha fareb e manzar tha
Kese meri giraft me ata.
wo to ek roshni ka paikar tha.
aake sehra me kiya mila ahmar.
esa mousam to khud mere ghar tha.